संदेश

काले तिल की की खेती होगी बंपर कमाई

चित्र
  तिल एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है। मानसून के अलावा, वे गर्मियों और अर्ध-सर्दियों के मौसम में भी लगाए जाते हैं। इस फसल को गुजरात और खासकर सौराष्ट्र में गर्मियों के मौसम में सफलतापूर्वक किया जा सकता है। ग्रीष्मकालीन तिल की खेती को ध्यान में रखने के लिए महत्वपूर्ण चीजें निम्नानुसार हैं आमतौर पर तिल की खेती को मुनाफ़े का सौदा नहीं माना जाता है, क्योंकि इसमें पैदावार कम होती है, लेकिन तिल की खेती यदि उन्नत तरीके से की जाए तो यह किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। उन्नत किस्म के बीजों के साथ गर्मियों के मौसम में तिल की खेती करना अच्छा रहेगा, क्योंकि यह मौसम तिल के लिए उपयुक्त होता है। कॉपर, मैंगनीज और कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, लोहा, जिंक, मोलिब्डेनम, विटामिन बी 1, सेलेनियम और डायट्री फाइबर से भरपूर तिल की खेती पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में की जाती है। वैसे तो साल में इसकी तीन फसलें प्राप्त की जाती हैं, मगर गर्मियों में तिल की खेती करना अच्छा विकल्प है, क्योंकि इस मौसम में अधिक पैदावार प्राप्त होत...

जयपुर में घूमने की जगह

चित्र
  Why Jaipur Known As Pink City:  भारत (India) में घूमने के लिए बहुत सी खूबसूरत और मन को भाने वाली जगह हैं। यही कारण है कि देश ही नहीं, दुनियाभर से लोग यहां घूमने आते हैं। यहां न सिर्फ कई सारी शानदार घूमने वाली जगह हैं, बल्कि देश का खानपान और पहनावा भी लोगों के बीच काफी मशहूर है। यहां हर राज्य की सीमा बदलते ही संस्कृति और परंपरा भी बदल जाती है। भारत की संस्कृति को करीब से देखने के लिए राजस्थान एक बहुत ही बेहतरीन जगह है, यहां का शाही अंदाज और परंपरा लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है। राजस्थान में न सिर्फ आपको ऐतिहासिक धरोहर देखने को मिलेगी, बल्कि आप यहां स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ उठा सकते हैं। बता दें कि राजस्थान में घूमने के लिए पिंक सिटी यानी जयपुर बहुत ही बेहतरीन जगह है, लेकिन अहम सवाल ये है कि जयपुर को पिंक सिटी क्यों कहा जाता है। हालांकि, बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि जयपुर के पिंक सिटी होने के पीछे एक ऐतिहासिक कहानी है। आइये जानें, जयपुर के पिंक सिटी बनने का इतिहास क्या है। जानिये जयपुर शहर का इतिहास बता दें कि कछवाहा वंश के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 18 नवंबर, 1927 में...

बुढापा नहीं आएगा अगर इसे खा लोगे तो

चित्र
 सहजने का नाम तो सबने सुना होगा जानें सहजन की पत्ती के फायदे सहजन का पेड़ उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का मूल है और यह सूखे का सामना कर सकता है। इस पेड़ के महत्वपूर्ण भाग इसकी फली, फूल और पत्तियाँ हैं, सहजन पारंपरिक औषधियों का एक प्रमुख तत्व है क्योंकि इसकी फली और पत्तियाँ दोनों ही कई तरह की बीमारियों के इलाज के लिए फायदेमंद हैं। सहजन के पत्ते और फली आमतौर पर दक्षिण भारतीय व्यंजनों में पाए जाते हैं। सहजन की फली का उपयोग कई व्यंजनों में किया जा सकता है, जैसे ड्रमस्टिक करी, सांभर और दाल। सहजन की पत्तियाँ कई हजारों वर्षों से अपने औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध हैं। प्राकृतिक औषधियों के रूप में सहजन की पत्तियों के फायदे नवीनतम वैज्ञानिक अध्ययनों से भी सिद्ध हो चुके हैं। आइये जानते हैं  सहजन की पत्ती के फायदे । सहजन की पत्ती के फायदे  सहजन पत्ती के फायदे बहुत हैं और इस पौधे का उपयोग सुंदरता से लेकर विभिन्न बीमारियों को रोकने और उनका इलाज करने में मदद करता है। सहजन के पत्ते के फायदे कुछ इस प्रकार हैं:  1.    कैंसर से लड़ता है सहजन के अर्क में ऐसे गुण होते हैं जो कैंसर के ...

लाल आलू की इस किस्म से होंगे मालामाल

चित्र
  आलू की खेती मुख्यतः   पश्चिम बंगाल , उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, गुजरात, ओडिशा, असोम, छत्तीसगढ़, झारखंड आदि प्रदेशों में बड़े पैमाने पर की जाती है। आलू फसल के अंतर्गत आने वाले कुल क्षेत्रफल के लगभग एक चौथाई भाग में लाल कंदीय आलू की खेती की जाती है। खासकर, बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश में लाल आलू की खेती अधिक क्षेत्र में की जाती है। यहां के उपभोक्ताओं की पहली पसंद लाल आलू है। कश्मीर के उपभोक्ता लाल छिलके वाले आलू को मांस के साथ पकाने में ज्यादा रुचि रखते हैं। इसके साथ ही उपभोक्ताओं की लाल कंदीय छिलके वाले आलू की मांग को देखते हुए पंजाब प्रांत के मोगा एवं गुरदासपुर क्षेत्र के कृषक भी अब लाल कंदीय किस्मों के बीज की मांग करने लगे हैं। लाल छिलके वाले कंदों के लिए उपभोक्ता/ग्राहक सफेद कंदों की तुलना में अधिक कीमत अदा करते हैं। भाकृअनुप-केन्द्रीय आलू अनुसंधानसंस्थान, शिमला द्वारा पूर्व में लाल छिलके तथा मध्यम परिपक्वता (90-100 दिन) वाली किस्मों जैसे कुफरी रेड, कुफरी सिन्दूरी, कुफरी लालिमा आदि का विकास किया गया था। इनके कन्द लाल, गोल आकार, मध्यम गहरी आंखों वाले तथा पिछेता झुलसा सहिष्...

पपीता की खेती से प्रति एकड़ 6 लाख तक कमाओ

चित्र
    पपीते की खेती तो एक बीघा में 5 लाख रुपये तक की होगी कमाई पपीता की खेती के लिए कितना हो मिट्टी का पीएच लेवल वैज्ञानिक रामपाल ने बताया कि पपीते की खेती के लिए मिट्टी का पीएच लेवल 6.0 और 7.0 के बीच सबसे अच्छा होता है। जल निकासी की भी पर्याप्‍त व्‍यवस्‍थ्‍ज्ञा होनी चाहिए। अगर पपीते के खेत में 24 घंटे से अधिक समय तक पानी रुक जाता है तो पौधे मर जाता है, उसे बचाना बेहद मुश्किल हो जाता है। इसलिए पपीता की खेती के लिए किसानों को ऊंची जमीन का चयन करना चाहिए, जहां  बारिश का पानी न भरे। खेत में पौधे लगाए, सीधे बीज की बुवाई न करें डॉ. रामपाल ने बताया कि पपीते की खेती के लिए खेत में ऊंचे मेड़ का निर्माण करना चाहिए। पपीते की खेती करने के लिए पौधे किसी ऊंची क्यारी या गमले या पॉलीथिन बैग में तैयार कर लेने चाहिए। जहां पौध तैयार करें, वहां बीज की बुवाई से पहले क्यारी को 10 फीसदी फार्मेल्डिहाइड के घोल का छिड़काव करके उपचारित करना चाहिए। इसके बाद बीज एक सेमी गहरे और 10 सेमी की दूरी पर बोना चाहिए। निराई-गुड़ाई और सिंचाई भी जरूरी डॉ. रामपाल ने बताया कि गर्मियों में पपीते की फसल की हर छह से स...